Sunday, October 29, 2017

लइका आ लइकी (लड़का और लड़की)

लघुकथा-8
लइका आ लइकी
मोहन- हम लइका आ लइकी में अंतर ना करेनी। एहीसे आपन दूनो लइकिन के लइकी ना मानके लइका मानेनी?
रमेस- जब लइकी आ लइका में अंतर ना मानेलS तो फिर लइकी के लइकिए काहें नइखS मानSत। लइकी के लइका मनले से समझ में आवSता की तू लइकी आ लइकी आ लइका में अंतर मानेलS
लड़का और लड़की
मोहन- मैं लड़का और लड़की में अंतर नहीं करता। इसीलिए अपनी दोनों लड़कियों को लड़की नहीं लड़का मानता हूँ।

रमेश- जब लड़का और लड़की में अंतर नहीं करते तो लड़की को लड़की ही क्यों नहीं मान रहे हो। लड़की को लड़का मानने से ही समझ में आ रहा है कि तुम लड़का और लड़की में अंतर मानते हो।

बाबागिरी

लघुकथा-7
बाबागिरी
जजमान कS देहल दक्षिना झोरा में ठूँसके दूनों हाथ से जजमान के आसिर्वाद दिहला कS बाद पंडीजी आज कS हालत पर बिचार ब्यक्त करत कहलें – अब बाबा लोगन के बाबागिरी छोड़ देबे के चाहीं।
ई सुनके जजमान क लइका बोल परले- रऊवाँ कब छोड़ब?
पंडीजी धीरे से सरकहवा नारा लगइलें आ लइका के प्रस्न जबाब में दू थपरा मिलल।
बाबागिरी
यजमान द्वारा दी गई दक्षिणा को झोले में ठूँसकर दोनों हाथों से यजमान को आशिर्वाद देने के बाद पंडित जी आज के हालात पर विचार व्यक्त करते हुए बोले- अब बाबाओं को बाबागिरी छोड़ देनी चाहिए।
यह सुनकर यजमान का बेटा बोल पड़ा- आप कब छोड़ेंगे?

पंडित जी चुपचाप चलते बने और बेटे को प्रश्न के उत्तर में दो थप्पड़ मिले।