Wednesday, November 15, 2017

संस्कारी पतोह (संस्कारी बहू)

लघुकथा-11
संस्कारी पतोह
गुरुजी- एगो संस्कारी पतोह क गुन बताSव।
सरिता- अइसन पतोह जवन घर कS कुल्ह काम करे। जवन कब्बो केहू के दिल ना दुखावे। घर के सभकर दिल से सेवा करे। सबसे पहिले उठ जाSव आ सबसे बात में सुते। घर में केहू से जबान ना लड़ावे (झगरा ना करे)... इहे कुल।
रीना- गुरुजी, अगर एगो बढ़िया नोकर क गुन पूछल जाव त ओकरा में एकरा से अलगा का होखे के चाही?
सबकेहू चुपचाप एक-दूसरा क मुँह देखे लगलें।
संस्कारी बहू
गुरु जी- एक संस्कारी बहू के गुण बताइए।
सरिता- ऐसी बहू जो घर के सारे काम करे। जो कभी किसी का दिल न दुखाए। घर के सभी लोगों की दिल से सेवा करे। सबसे पहले उठ जाए और सबसे बाद में सोए। घर में किसी से जबान न लड़ाए (झगड़ा न करे) ... आदि।
रीना- गुरु जी, यदि एक अच्छे नौकर के गुण पूछे जाएँ तो उसमें इससे अलग क्या होना चाहिए?

सब लोग चुपचाप एक-दूसरे का मुँह देखने लगे। 

संस्कार आ अविस्कार (संस्कार और अविस्कार)

लघुकथा-10
संस्कार आ अविस्कार
भारतवाला– तोहरा इहाँ क लइका-लइकी बहुत बिगड़ल बाड़न। चुम्मा-चाटी में तनिको संकोच ना करेलनसS। हमनीSक महान सभ्यता से कुछ सीSखजा। हमनीSक संस्कार में केहु ओरि आँख उठाके देखलो गुनाह हS
अङरेज- तोहरा केहें त लइकी के इसमाइल करावे खातिर लइका सबेरे से साँझ तक आगे-पीछे घूमत रहेलनजा आ आपन जवानी बरबाद करेलनजा, आ अंतिम में लुका-लुका के उहे कुल करेलनजा जवन हमनीSक करेनीSजा। एहसे बढ़िया त हमनिए क न संस्क्रिति बा, कि इ कुल फालतू क देखावा आ बनावटी परदा क चक्कर में समय बरबाद कइला क बजाय सब हरमेसिक नया-नया बात सोचत रहेला।
दूनों में एही बात पर धीरे-धीरे झगरा बढ़ जाता। तवले ओनिए से एगो आफिसर आइल त देSखके कहलस की अच्छा दूनों जाना आपन-आपन संस्क्रिति के महान साबित करेSS एकSएगो उदाहरन दS जा।
भारतवाला- संस्कार, संस्कार खाली (खोखड़) संस्कार।
अङरेज- सुई से लेके अंतरिछयान तक क अविस्कार।
संस्कार और अविस्कार
भारतीय- तुम्हारे यहाँ के लड़के-लड़कियाँ बहुत बिगड़े हुए हैं। चूमने-चाटने में थोड़ा-सा भी संकोच नहीं करते हैं। हमारी महान सभ्यता से कुछ सीखो। हमारे संस्कारों में किसी की ओर आँख उठाकर देखना भी गुनाह है।
अंग्रेज- तुम्हारे यहाँ तो लड़की को स्माइल कराने के लिए लड़के सुबह से शाम तक आगे-पीछे घूमते रहते हैं और अपनी जवानी बरबाद करते हैं, और अंत में लुक-छिपकर वही सब करते हैं जो हम लोग करते हैं। इससे अच्छी तो हमारी ही संस्कृति है, कि इन सब फालतू के दिखावों और बनावटी परदे के चक्कर में समय बर्बाद करने के बजाए नई-नई बातें सोचते रहते हैं।
दोनों में इसी बात पर धीरे-धीरे झगड़ा बढ़ जाता है। तभी उधर से ही एक ऑफिसर आता है तो देखकर बोला कि अच्छा दोनों लोग अपनी-अपनी संस्कृति को महान साबित करने के एक-एक उदाहरण दो।
भारतीय- संस्कार, संस्कार और खोखले संस्कार।

अंग्रेज- सुई से लेकर अंतरिक्षयान तक के अविष्कार।

Saturday, November 11, 2017

गुरु आ चेला (गुरु और शिष्य)

लघुकथा-9
गुरु आ चेला
मुंसीजी- आजकाल्ह लइकन क बिकास एहीसे नइखे होत कि ऊ गुरू के गुरू नइखन स समझत। एगो हमनी के परंपरा रहे। चेला लोग गुरुअन के दंडवत करसजा आ गोड़ भी दबावसजा। तब जाके असली चेला बन पावसजा।
बिद्यारथी- आप पइसा प काम करेवाला एगो अध्यापक बानी। आपके पढ़े-पढ़ावे खातिर सरकार बकायदे पइसा देतिया। एतने ना, सरकार जेतना पइसा देतिया ओकर एक चउथाइयो आप काम नइखीं करत। तबो आप अपना के गुरु कहवावल चाहतानी। कुछ त सरम करीं।
गुरु और शिष्य
अध्यापक- आजकल के लड़कों का विकास इसीलिए नहीं हो रहा है कि वे गुरु को गुरु नहीं समझते हैं। एक हमारी परंपरा थी। शिष्य लोग गुरुओं को दंडवत करते थे और पैर भी दबाते थे। तब जाकर वास्तविक शिष्य बन पाते थे।

विद्यार्थी- आप पैसे पर काम करने वाले एक अध्यापक हैं। आपको पढ़ने-पढ़ाने के लिए सरकार बकायदे पैसे दे रही है। इतना ही नहीं, सरकार जितने पैसे दे रही है उसका एक चौथाई भी आप काम नहीं कर रहे हैं। फिर भी आप अपने को गुरु कहलवाना चाहते हैं। कुछ तो शर्म कीजिए।