Wednesday, November 15, 2017

संस्कारी पतोह (संस्कारी बहू)

लघुकथा-11
संस्कारी पतोह
गुरुजी- एगो संस्कारी पतोह क गुन बताSव।
सरिता- अइसन पतोह जवन घर कS कुल्ह काम करे। जवन कब्बो केहू के दिल ना दुखावे। घर के सभकर दिल से सेवा करे। सबसे पहिले उठ जाSव आ सबसे बात में सुते। घर में केहू से जबान ना लड़ावे (झगरा ना करे)... इहे कुल।
रीना- गुरुजी, अगर एगो बढ़िया नोकर क गुन पूछल जाव त ओकरा में एकरा से अलगा का होखे के चाही?
सबकेहू चुपचाप एक-दूसरा क मुँह देखे लगलें।
संस्कारी बहू
गुरु जी- एक संस्कारी बहू के गुण बताइए।
सरिता- ऐसी बहू जो घर के सारे काम करे। जो कभी किसी का दिल न दुखाए। घर के सभी लोगों की दिल से सेवा करे। सबसे पहले उठ जाए और सबसे बाद में सोए। घर में किसी से जबान न लड़ाए (झगड़ा न करे) ... आदि।
रीना- गुरु जी, यदि एक अच्छे नौकर के गुण पूछे जाएँ तो उसमें इससे अलग क्या होना चाहिए?

सब लोग चुपचाप एक-दूसरे का मुँह देखने लगे। 

संस्कार आ अविस्कार (संस्कार और अविस्कार)

लघुकथा-10
संस्कार आ अविस्कार
भारतवाला– तोहरा इहाँ क लइका-लइकी बहुत बिगड़ल बाड़न। चुम्मा-चाटी में तनिको संकोच ना करेलनसS। हमनीSक महान सभ्यता से कुछ सीSखजा। हमनीSक संस्कार में केहु ओरि आँख उठाके देखलो गुनाह हS
अङरेज- तोहरा केहें त लइकी के इसमाइल करावे खातिर लइका सबेरे से साँझ तक आगे-पीछे घूमत रहेलनजा आ आपन जवानी बरबाद करेलनजा, आ अंतिम में लुका-लुका के उहे कुल करेलनजा जवन हमनीSक करेनीSजा। एहसे बढ़िया त हमनिए क न संस्क्रिति बा, कि इ कुल फालतू क देखावा आ बनावटी परदा क चक्कर में समय बरबाद कइला क बजाय सब हरमेसिक नया-नया बात सोचत रहेला।
दूनों में एही बात पर धीरे-धीरे झगरा बढ़ जाता। तवले ओनिए से एगो आफिसर आइल त देSखके कहलस की अच्छा दूनों जाना आपन-आपन संस्क्रिति के महान साबित करेSS एकSएगो उदाहरन दS जा।
भारतवाला- संस्कार, संस्कार खाली (खोखड़) संस्कार।
अङरेज- सुई से लेके अंतरिछयान तक क अविस्कार।
संस्कार और अविस्कार
भारतीय- तुम्हारे यहाँ के लड़के-लड़कियाँ बहुत बिगड़े हुए हैं। चूमने-चाटने में थोड़ा-सा भी संकोच नहीं करते हैं। हमारी महान सभ्यता से कुछ सीखो। हमारे संस्कारों में किसी की ओर आँख उठाकर देखना भी गुनाह है।
अंग्रेज- तुम्हारे यहाँ तो लड़की को स्माइल कराने के लिए लड़के सुबह से शाम तक आगे-पीछे घूमते रहते हैं और अपनी जवानी बरबाद करते हैं, और अंत में लुक-छिपकर वही सब करते हैं जो हम लोग करते हैं। इससे अच्छी तो हमारी ही संस्कृति है, कि इन सब फालतू के दिखावों और बनावटी परदे के चक्कर में समय बर्बाद करने के बजाए नई-नई बातें सोचते रहते हैं।
दोनों में इसी बात पर धीरे-धीरे झगड़ा बढ़ जाता है। तभी उधर से ही एक ऑफिसर आता है तो देखकर बोला कि अच्छा दोनों लोग अपनी-अपनी संस्कृति को महान साबित करने के एक-एक उदाहरण दो।
भारतीय- संस्कार, संस्कार और खोखले संस्कार।

अंग्रेज- सुई से लेकर अंतरिक्षयान तक के अविष्कार।

Saturday, November 11, 2017

गुरु आ चेला (गुरु और शिष्य)

लघुकथा-9
गुरु आ चेला
मुंसीजी- आजकाल्ह लइकन क बिकास एहीसे नइखे होत कि ऊ गुरू के गुरू नइखन स समझत। एगो हमनी के परंपरा रहे। चेला लोग गुरुअन के दंडवत करसजा आ गोड़ भी दबावसजा। तब जाके असली चेला बन पावसजा।
बिद्यारथी- आप पइसा प काम करेवाला एगो अध्यापक बानी। आपके पढ़े-पढ़ावे खातिर सरकार बकायदे पइसा देतिया। एतने ना, सरकार जेतना पइसा देतिया ओकर एक चउथाइयो आप काम नइखीं करत। तबो आप अपना के गुरु कहवावल चाहतानी। कुछ त सरम करीं।
गुरु और शिष्य
अध्यापक- आजकल के लड़कों का विकास इसीलिए नहीं हो रहा है कि वे गुरु को गुरु नहीं समझते हैं। एक हमारी परंपरा थी। शिष्य लोग गुरुओं को दंडवत करते थे और पैर भी दबाते थे। तब जाकर वास्तविक शिष्य बन पाते थे।

विद्यार्थी- आप पैसे पर काम करने वाले एक अध्यापक हैं। आपको पढ़ने-पढ़ाने के लिए सरकार बकायदे पैसे दे रही है। इतना ही नहीं, सरकार जितने पैसे दे रही है उसका एक चौथाई भी आप काम नहीं कर रहे हैं। फिर भी आप अपने को गुरु कहलवाना चाहते हैं। कुछ तो शर्म कीजिए।

Sunday, October 29, 2017

लइका आ लइकी (लड़का और लड़की)

लघुकथा-8
लइका आ लइकी
मोहन- हम लइका आ लइकी में अंतर ना करेनी। एहीसे आपन दूनो लइकिन के लइकी ना मानके लइका मानेनी?
रमेस- जब लइकी आ लइका में अंतर ना मानेलS तो फिर लइकी के लइकिए काहें नइखS मानSत। लइकी के लइका मनले से समझ में आवSता की तू लइकी आ लइकी आ लइका में अंतर मानेलS
लड़का और लड़की
मोहन- मैं लड़का और लड़की में अंतर नहीं करता। इसीलिए अपनी दोनों लड़कियों को लड़की नहीं लड़का मानता हूँ।

रमेश- जब लड़का और लड़की में अंतर नहीं करते तो लड़की को लड़की ही क्यों नहीं मान रहे हो। लड़की को लड़का मानने से ही समझ में आ रहा है कि तुम लड़का और लड़की में अंतर मानते हो।

बाबागिरी

लघुकथा-7
बाबागिरी
जजमान कS देहल दक्षिना झोरा में ठूँसके दूनों हाथ से जजमान के आसिर्वाद दिहला कS बाद पंडीजी आज कS हालत पर बिचार ब्यक्त करत कहलें – अब बाबा लोगन के बाबागिरी छोड़ देबे के चाहीं।
ई सुनके जजमान क लइका बोल परले- रऊवाँ कब छोड़ब?
पंडीजी धीरे से सरकहवा नारा लगइलें आ लइका के प्रस्न जबाब में दू थपरा मिलल।
बाबागिरी
यजमान द्वारा दी गई दक्षिणा को झोले में ठूँसकर दोनों हाथों से यजमान को आशिर्वाद देने के बाद पंडित जी आज के हालात पर विचार व्यक्त करते हुए बोले- अब बाबाओं को बाबागिरी छोड़ देनी चाहिए।
यह सुनकर यजमान का बेटा बोल पड़ा- आप कब छोड़ेंगे?

पंडित जी चुपचाप चलते बने और बेटे को प्रश्न के उत्तर में दो थप्पड़ मिले।

Sunday, October 15, 2017

अविस्कार क संकट (अविष्कार का संकट)

लघुकथा-6
अविस्कार क संकट
छात्र- गुरु जी, आप एतना जीतोड़ मेहनत क बाद रोबोटे के ब्रेन डिजाइन क नियम खोज लेले बानी, त ओकराके लोगन क सामने लियावत काहें नइखीं?
गुरुजी-बेटा, हम ई सोचत बानी कि कहीं इ हमनीके सभ्यता खातिर आत्मघाती न साबित हो जावS। पहिलहीं से संसार का संपत्ति क कुल्ह पूँजी 05% मनइन केहें बाटे। बकिया 95% मनई त एहसे जियत बा कि ऊ 05% मनइन के ओह सभ क जरूरत बा। जवदि ए जरूरत के मसीने (रोबोट) पूरा करे लागी त फिर ई 95% मनई त बिना मउअत के मर जईहें, एहसेकि मसीने के आपन साथी बनाके उ 05% मनई ई सबके लात मार दीSहें।
अविष्कार का संकट
छात्र- सर, आपने इतनी कड़ी मेहनत के बाद रोबोटिक ब्रेन डिजाइनिंग का सिद्धांत का खोज लिया है तो उसे लोगों के सामने क्यों नहीं ला रहे हैं?

प्राध्यापक : बेटे, मैं यह सोच रहा हूँ कि कहीं यह हमारी सभ्यता के लिए आत्मघाती साबित न हो। पहले से ही विश्व संपदा की कुल पूँजी 05% लोगों के पास है। शेष 95% लोग तो इसलिए जी रहे हैं कि उन 05% लोगों को उनकी जरूरत है। यदि इस जरूरत को मशीन (रोबोट) ही पूरा करने लगेगी तो फिर ये 95% लोग बेमौत मारे जाएँगे, क्योंकि मशीनों को अपना साथी बनाकर वे 05% लोग तुरंत इन सबको लात मार देंगे।

आदमी क चाल्हाँकी (मनुष्य की बुद्धिमानी)

लघुकथा-5
आदमी क चाल्हाँकी
एक बबुआ आपन बाबूजी से पुछलें- बाबुजी, का आदमी धरती क सबसे चाल्हाँक जीव ह?
बाबूजी- एह भरम में कबो मत रहिहS। तू आपन आस-पास क लोगन क बेवहार त तनि देखS!, रोज क समाचार त देखS! समुच्चे मानव सभ्यता क इतिहास त देखS। केतना छोट-छोट बात प मार, झगरा आ जुद्ध भइल बा आ हो रहल बा। अदमी में नया सोचे क छमता बहुत बा, लेकिन ओकरा नियन मूरख प्राणी केहू नइखे।
मनुष्य की बुद्धिमानी
एक बच्चे ने अपने पिता से पूछा- पिताजी क्या मनुष्य पृथ्वी का सबसे बुद्धिमान जीव है?

पिता- इस भ्रम में कभी मत रहना। तुम अपने आस-पास के लोगों का व्यवहार देखो!, रोज का समाचार देखो! पूरी मानव सभ्यता का इतिहास देखो! कितनी छोटी-छोटी बातों के लड़ाई, झगड़े और युद्ध हुए और हो रहे हैं। मनुष्य में रचनात्मक क्षमता बहुत है, लेकिन उसके जैसा मूर्ख प्राणी कोई नहीं है।

Wednesday, October 11, 2017

आदमी क भविष्य (मनुष्य का भविष्य)

लघुकथा-4
आदमी क भविष्य
एगो छोट लइका आपन बाबूजी से पुछलें- बाबूजी, आदमी आज धरती के बहुत बड़हन सक्ति बा। ओकर आज हर चीज पर अधिकार बा। ऊ जेवना चीज के जइसे चाहे, ओइसे परयोग कर सकेला और कर रहल बा। लेकिन जवना गति से उ परकिर्ति आ पराक्रितिक संसाधन क दोहन कर रहल बा, ओकरा के देखके रउवाँ के अदमी का भविष्य का लागता?
ओकर बाबूजी बैग्यानिक जबाब दिहलें- बेटा, आदमी अपने पएदा नइखे भइल। ओकरा के परकिर्तिए बनवले बिया। जेकरा के तू पराक्रितिक संसाधन कह रहल बाड़S, असली ऊ करोड़न साल से धरती में सड़Sके बनल चीज बा, जवन लाखन साल तक बेकारे परल रहल ह। तब परकिर्ति सोचलSसिहS कि एकर उपयोग कइसे कइल जाई। तब ओकरा मन में बिचार आइल कि एगो अइसन प्राणी बनाईं, जवन एह कुल्हनी के खपाS घले आ आज हमनीकS ऊहे कर रहल बानीSजा।
लइका- त अदमी क भविस्य का होई?
बाबूजी- कुछऊ ना बेटा, जइसे हमनीकS जरूरत परला प कवनो सामान लियावेनीजाS आ काम खतम होते कह कि ओके फेंक देनीजाS, चाहे खतम कर देनीजाS ओइसहीं हमनियोकS जरूरत खतम होते कहS कि परकिर्ति हमनी के नस्ट क दी।
लइका- का एहसे बचे क कवनो उपाय नइखे?
बाबूजी- बा, अगर हमनीकS परकिर्ति खातिर आपन जरूरत खतम भइला से पहिले कवनो अउरी काम खातिर अपना के उपयोगी बना लिहल जाव त बच सकेनीजा। नाहिं तS, पराक्रितिक संसाधन के खतम होत कहीं कि हमनियोके खतम हो जाएके।
मनुष्य का भविष्य
एक बच्चे ने अपने पिता से पूछा- पिताजी, मनुष्य आज पृथ्वी की बहुत बड़ी शक्ति है। उसका आज हर चीज पर अधिकार है। वह जिस चीज का जैसे चाहे वैसे प्रयोग कर सकता है और कर रहा है। लेकिन जिस गति से वह प्रकृति और प्राकृतिक संसाधनों का दोहन कर रहा है, उसे देखकर आपको मनुष्य का भविष्य क्या लगता है?
पिता ने वैज्ञानिक जवाब दिया- बेटे, मनुष्य स्वयं नहीं पैदा हुआ है। उसे प्रकृति ने बनाया है। जिसे तुम प्राकृतिक संसाधन कह रहे हो, दरअसल वे करोड़ों वर्ष से पृथ्वी में सड़कर बनी हुई चीजें हैं, जो लाखों से साल से बेकार पड़ी हुई थीं। फिर प्रकृति ने सोचा कि इनका कैसे उपयोग किया जाए? तब उसके मन में विचार आया कि एक ऐसा प्राणी बनाएँ जो इन सबका खपत कर डाले और आज हम वही कर रहे हैं।
बच्चा- तो मनुष्य का भविष्य क्या होगा?
पिता- कुछ नहीं बेटे, जैसे हम जरूरत पड़ने पर कोई सामान लाते हैं और काम खत्म होते ही उसे फेंक देते हैं, या नष्ट कर डालते हैं, वैसे ही हमारी जरूरत खत्म होते ही प्रकृति हमें नष्ट कर डालेगी।
बच्चा- क्या इससे बचने का कोई उपाय नहीं है?

पिता- है, अगर हम प्रकृति के लिए अपनी जरूरत खत्म होने से पहले किसी और काम के लिए अपने को उपयोगी बना लें तो बच सकते हैं, नहीं तो प्राकृतिक संसाधनों के खत्म होते-होते हम भी खत्म हो जाएँगे।

आदमी क खुराफात आ परकिर्ति क नियति (मनुष्य के खुराफात और प्रकृति की नियति)

लघुकथा-3
आदमी क खुराफात आ परकिर्ति क नियति
आज आदमी एतना खुरफाती हो गइल बा। उ परकिर्ति के तहस-नहस क घलले बा। परकिर्ति ओकरा के बुद्धि देके बहुत बड़ियार गलती क देले बिया, आ आज उ एकर खमियाजा भोगतिया। एपर चिंता क मुद्रा में जोंस बड़ा बेचारा क नजर से जिल ओरि देखलें।
जिल बड़ा आराम से कहलें- ना जी, अइसन कवनो बात नइखे। आदमी भी त परकिर्तिए क एगो उत्पाद बा। आज हमनीकS ब्रह्मांड क बारे में जेतना जान चुकल बानीजाS, ओहमें कतहीं जीवन नइखे मिलल। धरती प भी आदमी जइसन कवनो दूसर जीव ना बन पाइल, काहे?
जोंस- तू ही बतावS
 जिल- परकिर्ति बहुत सोच-समझ के अदमी के बनवले बा। पुरातात्विक खोजन से पता चल चुकल बा एह धरती प दू बेर परलय आइल आ धरती क जीवजगत एकही बेर में खतम हो गइल। लेकिन जीवन धीरे-धीरे फिर से पनफल आ आज एइसन बा। एसे झटका से नस्ट होखे में धरती/परकिर्ति के मजा ना आइल, एहसे, ए बारी उ सोचले बिया कि अपन रचना-संसार में ही अइसन चीज बनावल जाय जवन पूरा पर्यावरन के लाहे-लाहे खतम करे। एह परकार से अदमी के बनवलस आ आज अदमी ऊहे कर रहल बा। एहसे अदमी के खुराफात परकिर्ति क नियति क चलते ही हो रहल बा।
मनुष्य के खुराफात और प्रकृति की नियति
आज मनुष्य इतना खुराफाती हो गया है। उसने प्रकृति को तहस-नहस कर दिया है। प्रकृति ने उसे बुद्धि देकर बहुत बड़ी गलती कर दी, और आज वह इसका खामियाजा भुगत रही है। इस पर चिंता व्यक्त करते हुए जोंस ने बड़ी बेचारगी से जिल की ओर देखा।
जिल ने बड़ी सरलता से कहा- जी नहीं, ऐसी कोई बात नहीं है। मनुष्य भी तो प्रकृति की एक उत्पाद है। आज हम ब्रह्मांड के बारे में जितना जान चुके हैं, उसमें कहीं भी जीवन प्राप्त नहीं होता। पृथ्वी पर भी लाखों प्रकार के जीवों में मनुष्य जैसा कोई भी नहीं बन सका, क्यों?
जोंस- तुम्हीं बताओ।

जिल- प्रकृति ने बहुत सोच-समझ कर मनुष्य का निर्माण किया है। पुरातात्विक खोजों से पता चल चुका है कि इस पृथ्वी पर दो बार प्रलय आए और पृथ्वी का जीवजगत एक झटके में खत्म हो गया। किंतु जीवन फिर धीरे-धीरे पनपा और आज इस अवस्था में है। अतः झटके से नष्ट होने में पृथ्वी/प्रकृति को मजा नहीं आया, इसलिए इस बार उसने सोचा कि अपनी रचनाओं में ही एक ऐसी चीज बनाई जाए जो संपूर्ण पर्यावरण को धीरे-धीरे नष्ट करे। इस प्रकार उसने मनुष्य को बनाया और आज मनुष्य वही कर रहा है। इसलिए मनुष्य के खुराफात प्रकृति की नियति के ही परिणाम हैं।

Tuesday, September 26, 2017

धर्म के अंधभक्त और कुछ प्रश्न-3


(26-09-2017)
धर्म के अंधभक्त और कुछ प्रश्न-1
धर्म के अंधभक्त और कुछ प्रश्न-2

दुर्गा पूजा और मोहर्रम से शुरू हुई चर्चा का समापन धर्म के तार्किक परिष्कार पर खत्म हो जानी चाहिए। इसमें कोई शक नहीं कि धर्म अब केवल दिखावे का साधन रह गया है। यह आंडबर के साथ-साथ कुछ लोगों के लिए तो हिंसा का माध्यम भी बन चुका है। आज यदि हिंदू त्यौहारों को देखें तो पूजा के नाम पर भारी-भारी पांडाल लगाए लोगों में से कोई भी व्यक्ति एक भी दिन शांति से बैठकर ध्यानमग्न होकर ईष्ट देव (दुर्गा या कोई और देवी-देवता) का आह्वान करने का प्रयास करते हुए नहीं दिखता। बस लाउडस्पीकर में गाने बज रहे हैं और भक्तिधारा बह रही है। अब यहाँ तक कि ऊँ नमः शिवाय और गायत्री मंत्र जैसे दिव्य मंत्र को भी लोग कैसेट लगाकर छोड़ रहे हैं और मशीन पों-पों कर रही है। इतने भारी-भारी पांडाल, इतनी बड़ी भक्त-मंडली में किसी के पास समय नहीं है कि बारी-बारी से एक-एक घंटा ही सही बैठकर स्वयं जाप किया जाए। नहीं कर सकते तो गाने ही बजाते, बेकार में मंत्र की बेइज्जती क्यों कर रहे हैं। मुझे लगा था किसी सजग हिंदू आचार्य या संगठन द्वारा इस पर आपत्ति की जाएगी, लेकिन किसी को चिंता नहीं है। आप खुद बैठकर सोचें कि क्या ये मंत्र इस तरह अपमानित होने के लिए बने थे?? मशीन से बजाकर लोग कौन-सी सिद्धि पा लेंगे????
अंतिम बात यही है कि धर्म को जितना हो सके, तार्किक बनाइए। यदि किन्हीं कारणों से इसमें कुछ बुराइयों या आडंबरों का प्रवेश हो गया है तो उसे दूर कीजिए और धर्म का परिष्कार कीजिए। तभी यह लंबे समय बना रहेगा और शिक्षित लोगों द्वारा भी ग्राह्य होगा। यदि आप ऐसा नहीं कर सकते हैं तो इस शृंखला की पहली पोस्ट में सुरेंद्र की टिप्पणी से आपको चेतावनी देता हूँ कि धर्म में तर्क नहीं आएगा तो आशाराम, राम रहीम, रामपाल और फलाहारी राम आते रहेंगे, क्योंकि आप भी कहते हैं कि तर्क मत चुपचाप मान लो और वे भी कहते हैं कि तर्क मत करो और चुपचाप मान लो। फैसला आपके हाथ में हैं। इस पर बस एक उदाहरण देना चाहूँगा कि मदर टेरेसा द्वारा दीन-दुखियों की इतनी सेवा निष्काम तथा समर्पण भाव से की गई। लोग उन्हें संत मानने लगे, लेकिन ईसाई समुदाय द्वारा उनकी मृत्यु के कई साल बाद काफी छानबीन के बाद संत की उपाधि दी गई। हमारे यहाँ क्या होता है? गेरुए रंग का कपड़ा पहना, टीका लगाया, कंठी माला पहनी और हो गए बाबा जी.....। क्या आपको नहीं लगता है कि जो लोग बड़े-बड़े पांडाल लगाकर अचानक से माता रानी के भारी भक्त दिखने लगते हैं, उनके संदर्भ में यह भी देखा जाए कि बाकी दिनों में भक्ति कार्यों में कितने लगे रहते हैं? यह भी देखा जाए कि धार्मिक मामलों में उनकी जानकारी और रुचि कितनी है???
यही बात मुस्लिम धर्म के कार्यक्रमों के आयोजकों के लिए भी जरूरी है। अगर किसी धर्म को अपने धार्मिक आयोजकों के प्रति ऐसी आवश्यकताएँ नहीं महसूस हो रही हैं तो पक्का मान लीजिए कि वहाँ भक्ति अंधभक्ति में बदल चुकी है। अगर लगता है कि हमें ऐसा करना चाहिए तो फिर इसका रास्ता सोचना होगा, जो धर्म को केवल धर्म रहने दे, अंधभक्ति और उन्माद में न बदल दे। यदि वह रास्ता मिल गया तो दुर्गा पूजा विसर्जन और मोहर्रम के लिए पुलिस को अलग-अलग रास्ते नहीं बनाने पड़ेंगे, बल्कि एक ही रास्ते से दोनों समुदाय के लोग बिना किसी भय के शांतिपूर्वक निकल जाएँगे और दुनिया हमें परिपक्व समझने लगेगी।

आज इस्लाम और अल्लाह के नाम पर मुस्लिम जगत में ऐसी बहुत सी चीजें हो रही हैं, जिससे आम मुसलमानों को भी बेवजह परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद को तो बहुत हद तक राजनीतिक मामला कहा जा सकता है। पाकिस्तान और बंग्लादेश में अल्पसंख्यकों के हुए सामूहिक नरसंहार को भी कुछ हद तक ऐतिहासिक बताकर बचने की कोशिश की जा सकती है। लेकिन ईराक और सीरिया में आई.एस.आई.एस. द्वारा प्रायोजित आंतकवाद और अल्पसंख्यक यजीदियों के साथ क्रूरतम व्यवहार आज आपके जगत का सबसे बड़ा धब्बा है। आज संपूर्ण इस्लामिक जगत की ओर से जियो और जीने दो के नारे के साथ अपने देशों में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा और स्वतंत्रता बनाए रखने का नारा आना चाहिए। रोहिंग्या मुसलमानों को बेचारे की नजर से देखा जा रहा है, आज उनकी हालत पर किसे दया नहीं आएगी, लेकिन अभी हाल ही में म्यांमार की सेना ने उसी रखाइन इलाके में हिंदुओं की दो-दो सामूहिक कब्रें दिखाकर सनसनी पैदा कर दी है। आरोप है कि इन जगहों पर रोहिंग्या आंतकवादियों द्वारा हिंदुओं के नरसंहार के बाद दफनाया गया है। आज (26-09-2017 को) शाम 09:00 बजे Daily News Analysis में जी. न्यूज द्वारा म्यांमार से शरणार्थी बनकर आए लगभग 650 हिंदू परिवारों से बातचीत करके इस दावे को मजबूत किया गया। यदि यह सच है तो आप खुद सोचिए कि अब रोहिंग्या मुसलमान किस मुँह से भारत में शरण माँगेंगे। अब इस बात की सख्त जरूरत है कि इस्लामिक जगत के लोग ही आगे आएँ और संयुक्त राष्ट्र से इस मामले की निष्पक्ष जाँच करने की अपील करें। या तो म्यामांर सेना का झूठ सामने आ जाएगा या रोहिंग्या मुसलमानों के प्रति भारत सरकार की बात सही हो जाएगी। नहीं तो हिंदू समुदाय इनसे यह सोचकर भयभीत महसूस करेगा कि अल्पसंख्यक होने पर भी ये मौका मिलते ही हमारे लिए घातक हो सकते हैं। यदि ऐसा नहीं होता है तो याद रहे चाहे विकास आए या ना आए, यह भय ही काफी है भाजपा को अगले 02-04 चुनाव जिताने के लिए।

Sunday, September 24, 2017

धर्म के अंधभक्त और कुछ प्रश्न-2

(25-09-2017)
धर्म के अंधभक्त और कुछ प्रश्न-1
 कल ही मैंने दुर्गापूजा और मोहर्रम पर बंगाल सरकार के आदेश के पीछे की मंशा और धर्म के नाम हमारी दिशाहीनता तथा दिखावा के संदर्भ में संकेत करते हुए ईश्वर/अल्लाह और उनके भक्तों के सापेक्ष कुछ प्रश्न उपस्थित किए। इस पर लगभग 1100 मित्रों में से 20-25 लोगों की प्रतिक्रिया बताती है ओशो का वह कथन बिल्कुल सही है कि यह सोए हुए लोगों की दुनिया है। तर्कपूर्वक सोचने के लिए हमें जगना पड़ेगा, विचार करना पड़ेगा, तथ्यों को खँगालना पड़ेगा....। ये सभी काम परीश्रम के हैं, जो हम करना नहीं चाहते। हम अपनी समस्याओं का आसान-सा हल चाहते हैं कि हमें अपनी ओर से जहमत न उठानी पड़े और बने-बनाए रास्तों पर चलते हुए चुपचाप जीवन कट जाए। एक बड़े विद्वान का कथन है कि शिक्षा का अर्थ बड़ी-बड़ी डिग्रियाँ और नौकरियाँ प्राप्त करना नहीं है, बल्कि जीवन के प्रति सजग और तार्किक होने की भावना विकसित करना भी है। आज अफसोस की बात है कि शिक्षा को रोजगारपरक बनाते-बनाते हमने इसे केवल डिग्री और रोजगार पाने का माध्यम समझ लिया है। शिक्षा ऐसी जरूर हो कि रोटी, कपड़ा, मकान की समस्याओं का समाधान हो जाए, लेकिन ऐसी बिल्कुल न हो कि केवल रोटी, कपड़ा, मकान की समस्याओं का ही समाधान हो। यदि कोई शिक्षा व्यवस्था ऐसा करती है तो वह व्यवस्था हमें मानव पशु से ऊपर नहीं उठा सकती। हाल ही में आई एक फिल्म द जंगल बुक में भेड़िया मोगली से कहता है कि तुम इनसान के बच्चे हो, इनसान की तरह लड़ो। यही बात हमारे ऊपर लागू होती है। हम इनसान हैं। प्रकृति ने हमें सोचने-विचारने और तर्क करने की क्षमता दी है तो हमें कूपमंडूक (कूएँ का मेढक) की तरह आस-पास जितना दिख जाए उतने पर ही संतोष कर लेने के बजाए सोचना ही चाहिए, नहीं तो मानव जन्म निरर्थक है।
मेरे पिछले लेख पर टिप्पणी करते हुए एक मित्र ने सुझाव दिया कि मैं अपनी बातों में ईसाई और बौद्ध धर्मों का भी समावेश करके सबके बारे में ऐसा लिखूँ। सुझाव अच्छा है। मैंने पहले लिखा था तो मेरा उद्देश्य यह नहीं था कि हिंदू या इस्लाम धर्मों की कमियाँ निकाली जाएँ, या किसी भी धर्म व्यवस्था की कमी निकाली जाए। यह जरूर था कि हम बिना सोचे-समझे धर्म प्रति इतने रूढ़ हो चुके हैं कि हमें अपने पर इतना भी भरोसा नहीं रहा कि धार्मिक आयोजन की दिन भी हमारे अंदर सात्विक विचार न आकर हिंसक विचार आएँगे। दुर्गा विसर्जन और मोहर्रम के दिन हिंसा की संभावना दोनों धर्मों के लोगों की अपरिपक्वता और भटकाव को दिखाता है।
मित्र के सुझाव के बाद जब मैंने विचार किया तो मुझे लगा कि ईसाई और बौद्ध धर्म के बारे में न लिखकर मैंने अच्छा ही किया। सबसे पहले ईसाई धर्म के लोगों पर थोड़ा विचार कर लेते हैं। हम किस मुँह से कहेंगे कि धार्मिक या सांस्कृतिक रूप से तुम लोग गलत हो। यह तो हमारी संस्कृति की सीख है कि घर के अंदर से लेकर बाहर तक हर मामले में अनुकरण भी उन्हीं का करते हैं और उल्टे मुँह कहते भी हैं, कि उन्होंने हमारी संस्कृति को खराब कर दिया। अरे भाई, वे लोग आपसे जबरजस्ती तो कर नहीं रहे हैं, तो भी आप अंडरवियर तक उनकी संस्कृति का दिया हुआ क्यों पहनते हैं।
सुई से लेकर अंतरिक्षयान तक सब उनकी उपज है। अगर आज हम सीना तानकर कह लेते हैं कि मनुष्य आज चाँद या मंगल तक पहुँच चुका है तो यह उनकी सोच के बारे में बात हो रही है, हमारी सोच के बारे में नहीं। हम तो केवल उनका अनुकरण कर रहे हैं। अपनी सोच और उनकी सोच में अंतर देखना हो तो सरस्वती शिशु मंदिर और कानवेंट स्कूलों में पढ़ने-पढ़ाने के लिए लगने वाली भीड़ का अनुपात देखें। आप अपनी ड्रेस और अपने पास पड़े हुए एक-एक सामान को देखें, उसमें हम कहाँ हैं? यहाँ तक कि आप यही देख लें कि जिस विज्ञान के दम पर इन देवी-देवताओं के अस्तित्व पर प्रश्न खड़ा किया जाता है उसी विज्ञान के अविष्कारों- लाउडस्पीकर, इलेक्ट्रिक लाइट आदि द्वारा इन्हें महिमामंडित कर रहे हैं। ऐसे बहुत से तुलनात्मक प्रश्न खड़े किए जा सकते हैं, जिनका हमें अतार्किक उत्तर ही प्राप्त होगा
इसी प्रकार बौद्ध धर्म को लेकर भी सोचा जा सकता है। बौद्ध धर्म यह नहीं कहता है कि इस सृष्टि की रचना महात्मा बुद्ध ने की, या महात्मा बुद्ध इस सृष्टि को संचालित कर रहे हैं.... आदि। उसमें यह कहा जाता है कि महात्मा बुद्ध ने सत्य को समझने का एक मार्ग प्रशस्त किया। इसका संपूर्ण इतिहास उपलब्ध है। इसमें अतिरेकी प्रश्नों के लिए स्थान बहुत कम है। आज बौद्ध धर्म के अनुयायियों के कर्मकांडों में जो भी दिखावा की प्रवृत्तियाँ आई हैं उनमें उनके परिवेश का पर्याप्त असर है। पड़ोस में धुवाँ हो तो आप अपने घर को कितना भी साफ सुथरा कर लीजिए, दीवारें तो काली होंगी ही। मैं बौद्ध धर्म का अनुयायी नहीं हूँ, फिर भी मुझे गौतम बुद्ध की एक ही बात बहुत अच्छी लगी- बिना तर्क किए किसी की भी बात को मत मानों, मेरी भी नहीं। इसी बात ने मेरी नजरों में गौतम बुद्ध को महात्मा बुद्ध बना दिया। मैं भी तो घुमा-फिराकर वही बात कह रहा हूँ। आप सभी देवी-देवताओं को मानिए, अल्लाह को मानिए, पूजिए, सब कीजिए, लेकिन आप जिसे जिस रूप में मान रहे हैं, उसके बारे में एक बार तर्कपूर्वक सोचकर यह देख जरूर लीजिए कि क्या यह वही है जो मैं सोच रहा था या केवल मैं भ्रम में हूँ।

थोड़ी हल्की बात (मजाक में) करना चाहते हैं तो सुन लीजिए यदि आप मानते हैं कि कोई भी ईश्वर, जो पिछले 04-05 हजार सालों से अपने भक्तों पर पड़ने वाली विपत्ति में सहायता करने नहीं आया, आपके बुलाने पर आ जाएगा तो यह भी मान लीजिए कि मोदी जी काला धन वापस लाकर सबके खातों में 15-15 लाख डलवा कर रहेंगे। 
धर्म के अंधभक्त और कुछ प्रश्न-3

Saturday, September 23, 2017

धर्म के अंधभक्त और कुछ प्रश्न

(24-09-2017)
अभी नवरात्र चल रहा है और सभी दिशाओं से लाऊडस्पीकरों के माध्यम से भक्ति संगीत की भाँति-भाँति की धाराएँ बह रही हैं। नौ दिन तक रोज सुबह-शाम आरती का महाअभियान भी इसमें सम्मिलित है। संयोग से मुसलमानों का त्यौहार मुहर्रम भी इसी दौरान पड़ गया है। नवरात्र सबसे अधिक धूमधाम से पश्चिम बंगाल में मनाया जाता है। अभी वहाँ की ममता बनर्जी सरकार द्वारा दिया गया एक आदेश विवाद का विषय बन गया कि मुहर्रम के दिन दुर्गा विसर्जन नहीं होगा ताकि कोई अप्रिय घटना न घट सके। इस पर तत्काल हिंदूवादी कलकत्ता हाईकोर्ट गए और हाईकोर्ट ने उस दिन भी विसर्जन की अनुमति दी और पुलिस को दोनों धर्मों के कार्यक्रम के लिए अलग-अलग रास्ते तय करने का आदेश दिया। इसे देखकर मुझे खरगोश और तीतर का झगड़ा याद आ गया जिसमें बिल्ली पूरी रोटी खा जाती है। अगर दोनों धर्मों के लोग सचमुच अपने-अपने ईश्वर और अल्लाह के प्रति पूजाभाव से ऐसा कुछ कर रहे हों तो ऐसा प्रश्न उठना ही बिल्ली को रोटी खाने का न्योता देना है। साथ ही यह भी स्पष्ट हो गया कि हम धर्म और धार्मिक आयोजनों के नाम पर केवल और केवल दिखावा (आडंबर) कर रहे हैं, जिस पर तुरंत रोक लगाई जानी चाहिए। एक तो ऐसे आदेश की स्थिति नहीं आनी चाहिए, दूसरा कि यदि ऐसा आदेश किसी ने राजनीतिक स्वार्थ के लिए निकाल ही दिया हो तो हिंदू और मुस्लिम दोनों संगठनों की ओर से तत्काल एक पत्र जारी होना चाहिए था कि दोनों जुलूस एक ही गली से निकाले जाएँगे और एक पत्ता तक नहीं खड़खड़ाएगा। अभी भी समय है, उन्हें ऐसा करके अपनी परिपक्वता (सांप्रदायिक सौहार्द नहीं- यह शब्द ही गलत है) की मिसाल खड़ी करनी चाहिए। सोचिए दो धर्मों के लोग जिस दिन अपने-अपने ईश्वर/अल्लाह की पूजा-अर्चना (बंदगी) कर रहे हैं, उस दिन भी वे कोई हिंसक काम कर सकते हैं? और अगर वे ऐसा करते हैं तो सचमुच ईश्वर के भक्त या अल्लाह के बंदे हैं? एक समय में इन दोनों में से कोई एक बात ही सही होगी। या तो वे हिंसा नहीं करेंगे, या फिर वे ईश्वर के भक्त या अल्लाह के बंदे नहीं हैं। ये वही लालची और मूर्ख खरगोश और तीतर हैं जिनकी रोटी बिल्ली के रूप में राजनीतिक दल खा रहे हैं।
अगर ऐसा माहौल बना कि उस दिन भी हम एक-दूसरे पर विश्वास नहीं कर पा रहे हैं तो आप मान लीजिए कि हमारा धर्म शत-प्रतिशत दिखावा बन चुका है। यह कैसे हो सकता है कि आप चले थे ईश्वर/अल्लाह को खुश करने और रास्ते में मार-काट करने लगे। और वह भी इस कारण से दूसरा वाला भी वही काम कर रहा था। होना तो यह चाहिए कि एक ही गली से दोनों ओर से दोनों धर्मों के लोगों का जुलूस निकलता और हिंदू लोग मुसलमानों को आदाम-आदाब तथा मुसलमान लोग हिंदुओं को नमस्कार-नमस्कार करते निकल जाते। जरा सोचिए कि उस दृश्य को टी.वी. पर देखकर बाकी दुनिया को कैसा महसूस होता। हम गर्व से सीना तानकर कहते कि ये हैं परिपक्व लोग जो धर्म को धर्म की तरह मानते हैं और समझते हैं। अगर हम ऐसा नहीं कर रहे हैं तो यह हमारी असफलता है। जो ऐसा सोच या कर नहीं सकता वह धार्मिक नहीं है। उसके द्वारा किए जाने वाले किसी भी धार्मिक आयोजन पर हमेशा के लिए पाबंदी लगा देनी चाहिए।
आज अगर हम ऐसा नहीं कर पा रहे हैं तो मेरी समझ से उसका कारण एक ही है कि हम ईश्वर या अल्लाह से बहुत दूर चले गए हैं, या वह हमसे बहुत दूर चला गया है। मैं पिछले तीन-चार सालों से ईश्वर से कुछ प्रश्न करता आ रहा हूँ, और मैंने यह भी सोचा है कि जब तक इन प्रश्नों के उत्तर नहीं मिल जाते, मैं तो पूजा-पाठ करने से रहा। ये प्रश्न दोनों धर्मों के लोगों के सामने हैं। इनका उद्देश्य ईश्वर/अल्लाह का अपमान करना या किसी की आस्था पर चोट पहुँचाना नहीं है, बल्कि सबको एक बार सोचने के लिए विवश करना है।
हिंदू धर्म में 33 कोटि देवी-देवता माने गए हैं, जिनमें गणेश, शिव, विष्णु, लक्ष्मी, दुर्गा, हनुमान (सबके साथ जी) आदि  05-10 की पूजा मुख्य रूप से होती ही रहती है। हिंदू त्यौहार जुलाई-अगस्त में नागपंचमी से आरंभ होने के बाद अगले साल के मार्च-अप्रैल में होली तक चलते रहते हैं। इन्हीं लोगों से जुड़े त्यौहार बारी-बारी से आते हैं और सभी त्यौहारों में सभी देवी-देवताओं का किसी-न-किसी रूप में पूजन-अर्चन चलता रहता है। इनके श्लोक, आरती, भक्तिगीत आदि को ध्यानपूर्वक सुनकर समझने की कोशिश की जाए तो पता चलता है कि जिस भी देवी-देवता की वंदना की जा रही है वह बहुत ही शक्तिशाली है। अपने भक्तों की वह सदा सुनता है, जब भी हम उसे दुःख में पुकारते हैं, वह दौड़ा चला आता/आती है। जब भी पृथ्वी पर पाप बढ़ता है, वह अवतार लेता है और पापियों का नाश करता/करती है.......आदि।
घुमा-फिराकर ऐसी भी बातें हम देवताओं के बारे में करते या सोचते हैं, लेकिन कभी यह नहीं सोचते कि क्या सचमुच ऐसा है???? दुर्गा देवी का अंतिम बार अवतार महिषासुर का वध करने के लिए हुआ। उसके बाद वे कितनी बार पापियों का नाश करने के लिए सार्वजनिक रूप से अवतरित हुईं? हनुमान जी ने राम के साथ मिलकर कई राक्षसों का वध किया। उसके बाद वे कहाँ चले गए? यही प्रश्न अन्य देवी-देवताओं के बारे में भी पूछे जाने चाहिए। यदि वे हैं तो आकर अपना कर्म (पापियों का नाश और भक्तों की रक्षा) क्यों नहीं करते? अगर नहीं करते तो हर साल उनके नाम पर इतना प्रदर्शन और प्रदूषण करने का क्या मतलब। ऐसे कुछ प्रश्न जब मैं पंडे-पुजारियों से करता हूँ तो वे कहते हैं कि तुम नास्तिक हो, तुम नहीं समझोगे अथवा वे अदृश्य रूप से आते हैं, हमें पता नहीं चलता .... आदि-आदि। या यह भट्ठयुग चल रहा है जब पाप सिर से ऊपर निकल जाएगा तो जरूर आएँगे....।
मैं इतना बड़ा भक्त तो हूँ नहीं कि इन कोरी काल्पनिक बातों को मान लूँ। जिन प्रश्नों के आधार पर इन देवी-देवताओं के होने पर मैं अविश्वास करता हूँ उन्हें आपके भी समक्ष रखना चाहूँगा एक बार विचार जरूर करें। अगर ये देवी-देवता सचमुच इतने शक्तिशाली हैं और हमारी रक्षा करने के लिए तत्पर रहते हैं तो जब मध्यकाल में मुस्लिम शासकों ने आक्रमण किया, मंदिरों को बर्बाद किया, मुर्तियों को तोड़ा-उठाकर ले गए और पुजारियों का कत्लेआम किया, उनके बहू-बेटियों की इज्जत लूटी, तब इन देवी-देवताओं ने तत्काल अवतार लेकर उन्हें सबक क्यों नहीं सिखाया????
यदि यह आपको पुरानी बात लगती हो तो अभी के बारे में सोचिए कि पाकिस्तान और बंग्लादेश में लाखों हिंदुओं का कत्ल हुआ, उनमें से बहुतों की बहू-बेटियों से जबरन धर्म-परिवर्तन कराकर शादी की गई तब ये लोग कहाँ थे??? अगर यह बात भी विदेश की लग रही हो तो 20-25 साल पहले इसी देश में 05-07 लाख कश्मीरी पंडितों के घर तबाह करके लूट लिए गए उन्हें मार-मारकर भगाया गया, तब भी इनमें से कोई भी देवी-देवता उनकी रक्षा के लिए आगे क्यों नहीं आया???
ऐसे बहुत से उदाहरण हैं। अब आप खुद से प्रश्न कीजिए कि अगर ऐसी परिस्थितियों में ये देवी-देवता अपने भक्तों या अपने लोगों की रक्षा के लिए आगे नहीं आए तो आपको क्यों लगता है कि आपके ऊपर विपत्ति आएगी तो आपकी रक्षा के लिए ये प्रकट हो जाएँगे??? यदि आपको लगता है कि ये प्राकृतिक समस्याओं को रोक सकते हैं? तो पूछिए अपने शिवजी से उत्तराखंड में आए जल-प्रलय को उन्होंने क्यों नहीं रोका? या उसकी सूचना किसी भी रूप में अपने भक्तों को क्यों नहीं दी?, जबकि उसमें मरने वाले एक-डेढ़ लाख लोगों में लगभग 90% शिवभक्त थे?
अगर इन प्रश्नों का उत्तर नहीं मिलने के बावजूद आपको अपनी भक्ति पर उतना ही भरोसा है तो याद रखिए अभी भी कश्मीरी पंडितों को अपने ही देश में शरणार्थियों का जीवन जीना पड़ रहा है। सभी भक्त माता रानी के सामने व्रत रखकर आज से ही अनशन पर बैठ जाएँ कि जब तक उनकी समस्या हल नहीं हो जाती हम अपना व्रत नहीं तोड़ेंगे। जब बिना किसी प्रमाण के आप हर साल अनुष्ठान करते ही हैं तो एक बार यह भी करके देखें। या तो आपकी भक्ति प्रमाणित हो जाएगी या आपकी भक्ति खत्म हो जाएगी। कम-से-कम एक निष्कर्ष मिलेगा।
मुसलमान भी बड़े-बड़े लाऊडस्पीकर लगाकर रोज पाँच बार अल्ला-हो-अकबर करते हैं। इस्लाम में लिखा है- इसलिए करने का नियम है तो कीजिए, लेकिन एक बार जाँच तो लेना चाहिए कि आपकी यह आवाज अल्लाह तक पहुँच भी रही है या नहीं। पिछले एक दशक से इस्लामिक जगत अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रहा है। अफगानिस्तान के बाद इराक और सीरिया में जिहाद और अल्लाह के ही नाम पर मुसलमानों के हाथ से ही मुसलमान मारे जा रहे हैं। बड़े आराम में आप आतंकवादियों को कह देते हैं कि वे भटके हुए नौजवान हैं। आपको यह नहीं दिखाई दे रहा है कि इन भटके हुए हुए नौजवानों के कारण लाखों मुस्लिम मारे गए और लाखों का वर्तमान और भविष्य बर्बाद हो गया। अगर वे भटके हुए हैं, तो उन्हें रास्ता कौन दिखाएगा? मुस्लिम समाज को नेक रास्ता दिखाने का जिम्मा मुल्ले-मौलावियों के पास है, तो वे यह रास्ता दिखाते क्यों नहीं? किस बात का वे इंतजार कर रहे हैं? आखिर अल्लाह चुपचाप बैठकर क्या देख रहा है? या वह सोया हुआ है क्या?
अभी रोहिंग्या मुसलमानों का मामला चल रहा है। बेचारे, बेघर होने के बाद सर छुपाने के लिए छत तो छोड़िए पाँव रखने के लिए जमीन नहीं मिल रही है। इस मुद्दे पर मौलावी अल्लाह से विशेष दर्खवास्त क्यों नहीं करते??? सभी देशों मौलावी एक निश्चित दिन से मस्जिदों में अल्लाह-हो-अकबर करते हुए अनशन पर क्यों नहीं बैठ जाते कि हे अल्लाह, जब तक आप हमारी फरियाद नहीं सुनेंगे हम आपको बुलाते ही रहेंगे। या रोजे में ही यह व्रत ले लेते जब तक अल्लाह हमारी फरियाद नहीं सुन लेता- (भटके हुए नौजवानों को सदबुद्धि और बेघर मुसलमानों को छत नहीं देता) हम रोजा नहीं तोड़ेंगे। फिर या तो अल्लाह को आप सबकी फरियाद सुननी पड़ती या आप अल्लाह के बंदे हो जाते। फिर वही प्रश्न आपसे भी है, कि अगर रोहिंग्या मुसलमानों पर संकट आने पर अल्लाह चुप है तो आपको क्यों लगता है कि आपके ऊपर संकट आएगा तो वह आपकी रक्षा करेगा। स्वयं से एक बार प्रश्न जरूर करें।
अभी तक अरबों प्रकाशवर्ष का ब्रह्मांड देख लेने के बावजूद पृथ्वी ही एकमात्र ऐसे ग्रह के रूप में प्राप्त हुई है जिस पर जीवन है। इस पृथ्वी पर भी लाखों प्रकार के जीवधारी हैं जिनमें केवल मनुष्य ही सोच सकता है। यह बात हमें बहुत ही ख़ास (special) बनाती है। यदि हमें प्रकृति ने सोचने की क्षमता दी है तो कुछ विशेष प्रयोजन के लिए दिया होगा। इस क्षमता का प्रयोग अप्रमाणिक भक्ति के लिए करने के बजाए उस प्रयोजन को पाने की ओर उन्मुख होना ही जीवन की सफलता है। इस संसार में बहुत सारे विषय जानने के लिए पड़े हुए हैं। ईश्वर/ख़ुदा भी ऐसा ही एक विषय है। इसलिए मेरा विनम्र अनुरोध है कि ऐसे भक्त बनने से पहले एक बार तर्कपूर्वक विचार जरूर करें।
धर्म के अंधभक्त और कुछ प्रश्न-2
धर्म के अंधभक्त और कुछ प्रश्न-3

Thursday, September 7, 2017

अकादमिक संवाद : भाग – 02

प्रश्न : अकादमिक जगत में काम/मेहनत करने वाले व्यक्ति की सबसे बड़ी समस्या क्या है?
उत्तर : अनेक औपचारिकताओं को पूरा करते हुए काम करना और अपने ऊपर बैठे हरामखोरों को खुश भी रखना।
प्रश्न : ये हरामखोर कौन हैं?
उत्तर : जो पूरे दिन, पूरे हप्ते, पूरे महीने, पूरे साल एक भी अकादमिक काम नहीं करते। बस विभिन्न पदों पर बैठकर सरकार के पैसे को हराम का समझकर हजम करते हैं।
प्रश्न : आपको इनसे क्या समस्या है?
उत्तर : ये कुछ करते तो नहीं हैं। जब आप कुछ करने चलिए तो बीच में जरूर नाम और पद की मर्यादा याद दिलाने जरूर चले आते हैं।
प्रश्न : तो आप उन्हें छोड़ क्यों नहीं देते?

उत्तर : सरकारी तंत्र के अनुसार यह संभव नहीं है। फिर भी यदि आप ऐसा कर भी देते हैं तो ये पीठ पीछे षड़यंत्र करके आपको फँसा भी देंगे। स्पष्ट है आप ऐसा तभी करना चाहेंगे जब आप नौकरी छोड़ देने की कूवत रखते हों। नहीं तो चुपचाप सहने के अलावा आपके पास कोई चारा नहीं है।

Saturday, September 2, 2017

अकादमिक संवाद : भाग- 01

प्रश्न : आज अकादमिक जगत में सबसे अधिक संख्या किस तरह के विद्वानों की है?
उत्तर : बिना अपने कुछ किए दूसरों के कामों में अपना नाम डलवाकर पचर-पचर करने वालों की।
प्रश्न : किसी काम को असफल करने का सबसे अच्छा तरीका क्या है?
उत्तर : उसे सरकारी तरीके से करना।
प्रश्न : कोई करने के लिए सबसे ज्यादा formalities कहाँ होती हैं?
उत्तर : सरकारी संस्थानों में।
प्रश्न : सबसे ज्यादा भ्रष्टाचार कहाँ होता है?

उत्तर : सरकारी संस्थानों में।

सफल जिनगी (सफल जीवन)

लघुकथा-2
सफल जिनगी
भक्त : बाबाएगो सफल जीनगी क का सिद्धांत बा?
बाबा : 3+1 सिद्धांत बा। 1. स्वस्थ रहल। 2. खुसहाल रहल 3. केहु क अनभल ना सोचल।
भक्त : आ ई ‘3+1’ का हS?
बाबा : एतना अ सभ बहुत पहिलहीं से कहत आ रहल बा। एहीसे चउथा बा- एकनी प अमल भी कइल।
सफल जीवन
भक्त : बाबाएक सफल जीवन के क्या सिद्धांत हैं?
बाबा : 3+1 सिद्धांत हैं। 1. स्वस्थ रहना। 2. खुश रहना और 3. किसी का अहित न सोचना।
भक्त : और यह ‘+1’ क्या है?
बाबा : इतना तो सब बहुत पहले से कहते आ रहे हैं। इसीलिए चौथा है- इन पर अमल भी करना।


Saturday, August 26, 2017

बेटा आ पतोह कS सेवा (बेटे और बहू की सेवा)

कड़वी लघुकथा-1
बेटा आ पतोह कS सेवा
सहर में काम करे वाला लइका क बियाह क बाद माई-बाबू कहलें- पतोह के कुछ दिन हमनिए केहें रहे दS बेटा।
बेटा कहलें- ठीक बा।
आ फिर उ सहर चल गइलें।
06 महीना बाद जब उ वापस अइलें त उ आपन मेहरारू के सहर ले जाए के बात फिर से चलवलें।
माई-बाबू कहलें- तोरा के 20 साल पलनी-पोसनी जा त कुछ साल त एकराके हमनीकS सेवा करे दे।
अब लइका से रहल न गइल- उ कहलें- ई बियाह कके हमार मेहरारू बSनके आइल बिया कि तोहन लोग के नोकरानी। हमरा के पालला-पोसला क एहसान क बदला एकरा से काहे लेत बानीSजा। त फिर हमहूँ एहिजे रह जात बानी, दूनो परानी मिल के सेवा कSरेके।
सीख : लइका क सेवा कइला क बदले पतोह से सेवा करावे खातिर सोचला से पहिले इहोS देख लेव कि एकरा चलते उन्हन के अलगा ना रहे के परे। 25-26 साल में जेकर बियाह हो रहल बा, ओहू क त कुछ अरमान होई।
आदर्स ना यथार्थ सोचीं।
बेटे और बहू की सेवा
शहर में काम करने वाले बेटे की शादी के बाद माता पिता ने कहा- बहु को कुछ दिन हमारे ही पास रहने दो,बेटा।
बेटे ने कहा- ठीक है।
और फिर शहर चला गया।
6 महीने बाद जब वह वापस आया तो उसने अपनी दुल्हन को शहर ले जाने प्रस्ताव फिर से रखा।
 माता पिता ने कहा- तुझे 20 साल पाला पोसा तो कुछ साल इसे हमारी सेवा करने दे।
अब बेटे से रहा नहीं गयावह बोला- यह शादी करके मेरी पत्नी बनने आई है आप लोगों की सेविकामुझे पालने पोसने के एहसान का बदला इससे क्यों ले रहे हैंतो फिर मैं भी यहीं रह जाता हूँ। दोनों लोग मिलकर सेवा करेंगे......
शिक्षा : बेटे की सेवा के बदले बहू से सेवा कराने के लिए सोचने से पहले यह भी देखें कि इस कारण उन्हें अलग न रहना पड़े। 25-26 साल जिसकी शादी हो रही हैउसके भी तो कुछ अरमान होंगे।

आदर्श नहीं यथार्थ सोचें।